Somwar vrat puja vidhi in Hindi | सोमवार – व्रत कथा , पूजा विधि और लाभ


Somwar vrat puja vidhi in Hindi (Monday Fasting rules in Hindi), सोमवार का दिन देवो के देव महादेव सबके अराध्य भोले शिव शंकर को समर्पित हैं | हिन्दू धर्म ग्रंथो तथा प्राचीन मान्यताओ की माने तो सोमवार का व्रत और पूजा विधि अत्यंत हितकारी और सभी मनोकामनाओ को पूर्ण करने वाला हैं | लेकिन किसी भी व्रत को प्रारम्भ करने के लिए उसके विधि-विधान की पूर्ण जानकारी होना बहुत ही आवश्यक है ताकि व्रत पूरे विधि-विधान से सम्पूर्ण हो सके क्यूंकि किसी भी व्रत का पूर्ण लाभ तभी मिलता हैं जब उसे सच्चे तन मन और विधि-विधान से किया जाऐ | तो आइये सोमवार व्रत कब और कैसे करें जाने। ……
i) सोमवार व्रत कब शुरु करना चाहिए (When should do Monday Fast)
ii) सोमवारी व्रत पूजन सामग्री
iii) सोमवार व्रत पूजन विधि (Monday Fasting rule and method in Hindi)
iv) सोमवारी व्रत कथा
v) सोमवारी व्रत का उद्द्यापन कैसे करें?
vi) सोमवार व्रत से लाभ (Monday Fasting Benefits in Hindi)

Somwar vrat puja vidhi in Hindi




सोमवार व्रत कब शुरु करना चाहिए ( When should start Monday Fasting)

Somwar vrat puja vidhi, सोमवार के व्रत तीन प्रकार के है- साधारण प्रति सोमवार, सोम्य प्रदोष और सोलह सोमवार – विधि तीनो की एक जैसी होती है लेकिन तीनों की कथा अलग-अलग है। वैसे सोमवार का व्रत कभी भी शुरू कर सकते हैं लेकिन कोई भी व्रत(Fast) प्रारम्भ करने से पहले उसके प्रारम्भ मास, पक्ष, तिथि तथा विधि का ज्ञान अवश्य होना चाहिए।
सोमवारी व्रत का प्रारम्भ श्रावण, चैत्र, वैशाख, कार्तिक या मार्गशीर्ष के महीनो के शुक्ल पक्ष के प्रथम सोमवार से ही करना विशेष लाभकारी हैं । इस व्रत को ५ वर्ष अथवा सोलह(16) सोमवार पर्यंत पूरी निष्ठा के साथ करने का प्रवाधान हैं । चैत्र, शुक्लाष्टमी तिथि, आर्द्र नक्षत्र, सोमवार को अथवा श्रावण मास के प्रथम सोमवार को प्रारम्भ करने का विशेष महत्त्व है।
वेद पुराणों के अनुसार चैत्र मास में सोमवार का व्रत करने से गंग-स्नान के समान, वैशाख मास में कन्यादान के समान, ज्येष्ठ मास में पुष्कर में स्नान करने के समान, आषाढ़ मास में यज्ञफल के समान, श्रावण में अश्वमेघ यज्ञ के समान, भाद्रपद मास में गोदान के समान, आश्विन माश में सुर्य ग्रहण में कुरुक्षेत्र के सरोवर में स्नान करने के समान तथा कर्तिक में ज्ञानी ब्रह्मणों को दान करने के समान पुण्य प्राप्त होता है।

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सोमवारी व्रत पूजन सामग्री | Somwar vrat pujan samagri list

Somwar vrat puja vidhi, वैसे तो भगवान शिव बहुत ही भोले हैं सच्ची मन से आराधना मात्र से वो खुश हो जाते हैं | लेकिन कुछ खास पूजन सामग्री हैं जिसका उपयोग वेदो और शास्त्रों में वर्णित हैं। .

i) जल कलश, गंगा जल, कच्चा दूध और दही।
ii) घी, शहद और चीनी।
iii) केसर
iv) वस्त्र
v) चन्दन रोली
vi) मौली
vii) चावल ( अक्षत ), फूलमाला , फूल
viii) बेल पत्र
ix) धूप , दीप , अगरबत्ती
x) माचिस
xi) कपूर
xii) फल और मेवा
xiii) दक्षिणा के पैसे




सोमवार व्रत पूजन विधि | Somwar vrat puja vidhi

Somwar vrat puja vidhi in Hindi, सोमवार के दिन प्रात:काल उठकर नित्य-क्रम कर स्नान कर लें। स्वच्छ वस्त्र धारण करें। पूजा गृह को स्वच्छ कर शुद्ध कर लें। सभी सामग्री एकत्रित कर लें। शिव भगवान की प्रतिमा के सामने आसन पर बैठ जायें। किसी भी पूजा या व्रत को आरम्भ करने के लिये सर्व प्रथम संकल्प करना चाहिये। व्रत के पहले दिन संकल्प किया जाता है। उसके बाद आप नियमित पूजा और व्रत करें।

सोमवार व्रत पूजन संकल्प विधि |

सबसे पहले हाथ में जल, अक्षत, पान का पत्ता, सुपारी और कुछ सिक्के लेकर निम्न मंत्र के साथ संकल्प करें:‌ –
ॐ विष्णुर्विष्णुर्विष्णुः। श्री मद्भगवतो महापुरुषस्य विष्णोराज्ञया प्रवर्तमानस्याद्य श्रीब्रह्मणो द्वितीयपरार्द्धे श्रीश्वेतवाराहकल्पे वैवस्वतमन्वन्तरेऽष्टाविंशतितमे कलियुगे प्रथमचरणे जम्बूद्वीपे भारतवर्षे भरतखण्डे आर्यावर्तान्तर्गतब्रह्मावर्तैकदेशे पुण्यप्रदेशे बौद्धावतारे वर्तमाने यथानामसंवत्सरे अमुकामने महामांगल्यप्रदे मासानाम्‌ उत्तमे अमुकमासे अमुकपक्षे अमुकतिथौ अमुकवासरान्वितायाम्‌ अमुकनक्षत्रे अमुकराशिस्थिते सूर्ये अमुकामुकराशिस्थितेषु चन्द्रभौमबुधगुरुशुक्रशनिषु सत्सु शुभे योगे शुभकरणे एवं गुणविशेषणविशिष्टायां शुभ पुण्यतिथौ सकलशास्त्र श्रुति स्मृति पुराणोक्त फलप्राप्तिकामः अमुकगोत्रोत्पन्नः अमुक नाम अहं अमुक कार्यसिद्धियार्थ सोमवार व्रत प्रारम्भ करिष्ये ।
तद्पश्चात सभी वस्तुएँ भगवान शिव के पास छोड़ दें।
अब दोनों हाथ जोड़कर शिव भगवान का ध्यान करें।
आवाहन:-
अब हाथ में अक्षत तथा फूल लेकर दोनों हाथ जोड़ लें और भगवान शिव का आवाहन करें ।
ऊँ शिवशंकरमीशानं द्वादशार्द्धं त्रिलोचनम्।
उमासहितं देवं शिवं आवाहयाम्यहम्॥
हाथ में लिये हुए फूल और अक्षत शिव भगवान को समर्पित करें।
सबसे पहले भगवान शिव पर जल समर्पित करें।
जल के बाद सफेद वस्त्र समर्पित करें।
सफेद चंदन से भगवान को तिलक लगायें एवं तिलक पर अक्षत लगायें।
सफेद पुष्प,धतुरा,बेल-पत्र,भांग एवं पुष्पमाला अर्पित करें।
अष्टगंध, धूप अर्पित कर, दीप दिखायें।
भगवान को भोग के रूप में ऋतु फल या बेल और मिष्ठान अर्पित करें।
इसके बाद सोमवार व्रत कथा को पढ़े अथवा सुने।तत्पश्चात शिव जी की आरती करें । उपस्थित जनों को आरती दें और स्वयं भी आरती लें। प्रसाद सभी उपस्थित जनों में वितरित करें। स्वयं के लिये थोड़ा रख लें। व्रत खोलते समय सबसे पहले प्रसाद ग्रहण करें। उसके बाद भोजन करें। व्रत मे फलाहार या पारण का कोई खास नियम नहीं है|

सोमवारी व्रत कथा | Somwar vrat puja vidhi katha in Hindi

एक समय की बात है, किसी नगर में एक साहूकार रहता था. उसके घर में धन की कोई कमी नहीं थी लेकिन उसकी कोई संतान नहीं थी इस कारण वह बहुत दुखी था. पुत्र प्राप्ति के लिए वह प्रत्येक सोमवार व्रत रखता था और पूरी श्रद्धा के साथ शिव मंदिर जाकर भगवान शिव और पार्वती जी की पूजा करता था.

उसकी भक्ति देखकर एक दिन मां पार्वती प्रसन्न हो गईं और भगवान शिव से उस साहूकार की मनोकामना पूर्ण करने का आग्रह किया. पार्वती जी की इच्छा सुनकर भगवान शिव ने कहा कि ‘हे पार्वती, इस संसार में हर प्राणी को उसके कर्मों का फल मिलता है और जिसके भाग्य में जो हो उसे भोगना ही पड़ता है.’ लेकिन पार्वती जी ने साहूकार की भक्ति का मान रखने के लिए उसकी मनोकामना पूर्ण करने की इच्छा जताई.

माता पार्वती के आग्रह पर शिवजी ने साहूकार को पुत्र-प्राप्ति का वरदान तो दिया लेकिन साथ ही यह भी कहा कि उसके बालक की आयु केवल बारह वर्ष होगी. माता पार्वती और भगवान शिव की बातचीत को साहूकार सुन रहा था. उसे ना तो इस बात की खुशी थी और ना ही दुख. वह पहले की भांति शिवजी की पूजा करता रहा.

कुछ समय के बाद साहूकार के घर एक पुत्र का जन्म हुआ. जब वह बालक ग्यारह वर्ष का हुआ तो उसे पढ़ने के लिए काशी भेज दिया गया. साहूकार ने पुत्र के मामा को बुलाकर उसे बहुत सारा धन दिया और कहा कि तुम इस बालक को काशी विद्या प्राप्ति के लिए ले जाओ और मार्ग में यज्ञ कराना. जहां भी यज्ञ कराओ वहां ब्राह्मणों को भोजन कराते और दक्षिणा देते हुए जाना.

दोनों मामा-भांजे इसी तरह यज्ञ कराते और ब्राह्मणों को दान-दक्षिणा देते काशी की ओर चल पड़े. रात में एक नगर पड़ा जहां नगर के राजा की कन्या का विवाह था. लेकिन जिस राजकुमार से उसका विवाह होने वाला था वह एक आंख से काना था. राजकुमार के पिता ने अपने पुत्र के काना होने की बात को छुपाने के लिए एक चाल सोची.

साहूकार के पुत्र को देखकर उसके मन में एक विचार आया. उसने सोचा क्यों न इस लड़के को दूल्हा बनाकर राजकुमारी से विवाह करा दूं. विवाह के बाद इसको धन देकर विदा कर दूंगा और राजकुमारी को अपने नगर ले जाऊंगा. लड़के को दूल्हे के वस्त्र पहनाकर राजकुमारी से विवाह कर दिया गया. लेकिन साहूकार का पुत्र ईमानदार था. उसे यह बात न्यायसंगत नहीं लगी.
उसने अवसर पाकर राजकुमारी की चुन्नी के पल्ले पर लिखा कि ‘तुम्हारा विवाह तो मेरे साथ हुआ है लेकिन जिस राजकुमार के संग तुम्हें भेजा जाएगा वह एक आंख से काना है. मैं तो काशी पढ़ने जा रहा हूं.’

जब राजकुमारी ने चुन्नी पर लिखी बातें पढ़ी तो उसने अपने माता-पिता को यह बात बताई. राजा ने अपनी पुत्री को विदा नहीं किया जिससे बारात वापस चली गई. दूसरी ओर साहूकार का लड़का और उसका मामा काशी पहुंचे और वहां जाकर उन्होंने यज्ञ किया. जिस दिन लड़के की आयु 12 साल की हुई उसी दिन यज्ञ रखा गया. लड़के ने अपने मामा से कहा कि मेरी तबीयत कुछ ठीक नहीं है. मामा ने कहा कि तुम अंदर जाकर सो जाओ.

शिवजी के वरदानुसार कुछ ही देर में उस बालक के प्राण निकल गए. मृत भांजे को देख उसके मामा ने विलाप शुरू किया. संयोगवश उसी समय शिवजी और माता पार्वती उधर से जा रहे थे. पार्वती ने भगवान से कहा- स्वामी, मुझे इसके रोने के स्वर सहन नहीं हो रहा. आप इस व्यक्ति के कष्ट को अवश्य दूर करें.

जब शिवजी मृत बालक के समीप गए तो वह बोले कि यह उसी साहूकार का पुत्र है, जिसे मैंने 12 वर्ष की आयु का वरदान दिया. अब इसकी आयु पूरी हो चुकी है. लेकिन मातृ भाव से विभोर माता पार्वती ने कहा कि हे महादेव, आप इस बालक को और आयु देने की कृपा करें अन्यथा इसके वियोग में इसके माता-पिता भी तड़प-तड़प कर मर जाएंगे.

माता पार्वती के आग्रह पर भगवान शिव ने उस लड़के को जीवित होने का वरदान दिया. शिवजी की कृपा से वह लड़का जीवित हो गया. शिक्षा समाप्त करके लड़का मामा के साथ अपने नगर की ओर चल दिया. दोनों चलते हुए उसी नगर में पहुंचे, जहां उसका विवाह हुआ था. उस नगर में भी उन्होंने यज्ञ का आयोजन किया. उस लड़के के ससुर ने उसे पहचान लिया और महल में ले जाकर उसकी खातिरदारी की और अपनी पुत्री को विदा किया.

इधर साहूकार और उसकी पत्नी भूखे-प्यासे रहकर बेटे की प्रतीक्षा कर रहे थे. उन्होंने प्रण कर रखा था कि यदि उन्हें अपने बेटे की मृत्यु का समाचार मिला तो वह भी प्राण त्याग देंगे परंतु अपने बेटे के जीवित होने का समाचार पाकर वह बेहद प्रसन्न हुए. उसी रात भगवान शिव ने व्यापारी के स्वप्न में आकर कहा- हे श्रेष्ठी, मैंने तेरे सोमवार के व्रत करने और व्रतकथा सुनने से प्रसन्न होकर तेरे पुत्र को लम्बी आयु प्रदान की है. इसी प्रकार जो कोई सोमवार व्रत करता है या कथा सुनता और पढ़ता है उसके सभी दुख दूर होते हैं और समस्त मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं.

सोमवारी व्रत का उद्यापन कैसे करें? | Somwar vrat puja vidhi udyapan

सोमवार व्रत का उद्यापन श्रावण मास के प्रथम या तीसरे सोमवार को करना सबसे अच्छा माना गया है। इस व्रत के उद्यापन में उमा-महेश और चंद्रदेव का संयुक्त रुप से पूजन और हवन किया जाता है।
सुबह स्नान कर सफेद कपड़े पहनकर पूजा के लिए केले के खंबों का सुन्दर मण्डप बनाया जाता है।
सफेद वस्त्रों, फूलों और आम के पत्तों से इस मण्डप को सजाएं और घी के कुछ दीपक जलाएं।
किसी विद्वान ब्राह्मण से उसमें वेदी बनाकर भगवान शिव, पार्वती और चन्द्रदेव को स्थापित करवाकर उनका विधिवत पूजन कराएं। चंद्रदेव सौंदर्य, ज्योति, सरसता और मधुर गुणों के स्वामी है। इसलिए सोमवार व्रत और उद्यापन में सुंदरता एवं सफेद वस्तुओं का विशेष महत्व है।
शास्त्रीय विधान के अनुसार इस व्रत के उद्यापन में पूजा के बाद हवन भी किया जाना चाहिए।
हवन में तिल, जो और घी में हवन सामग्री मिलाकर दो सौ साठ आहुतियाँ दी जाती है।
आहुतियाँ देते समय त्र्यंबक नम: मंत्र का बोलें।
उद्यापन में कम से कम उतने ब्राह्मणों को भोजन तो कराना ही चाहिए जितने वर्ष तक आपने यह व्रत किया है, वैसे अधिक की कोई सीमा नहीं है।
जिन मूर्तियों एवं पात्रों का प्रयोग आप पूजा में करते रहे हैं, वे सभी यज्ञ कराने वाले ब्राह्मण को दे दी जाती है तथा सभी ब्राह्मणों को यथाशक्ति दक्षिणा और वस्त्र आदि।

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